अपने मन का रावण मारें, यही आज पैगाम।

-गिरीश पंकज-

बहुत हो गया ऊंचा रावण, बौना होता राम।
मेरे देश की उत्‍सव-प्रेमी जनता तुझे प्रणाम।।

नाचो गाओ मौज मनाओ कहां जा रहा देश
मत सोचो काहे की चिंता व्‍यर्थ न पालो क्‍लेश
हर बस्‍ती में है इक रावण, उसी का है अब नाम।

नैतिकता-सीता बेचारी, करती चीख पुकार
देखो मुझे हर लिया, अबला हूं लाचार
पश्चिम का रावण हंसता है अब तो सुबहो शाम।

राम-राज इक सपना है पर देख रहे हैं आज
नेता, अफसर, पुलिस सभी का फैला गुंडाराज
डान, माफिया, रावण-सुत बन करते काम तमाम।

महंगाई की सुरसा प्रतिदिन निगल रही सुख-चैन
लूट रहे हैं व्‍यापारी सब, रोते निर्धन नैन
दो पाटन के बीच पिस रहा अब गरीब हे राम।

बहुत बढा है कद रावण का, हो ऊंचा अब राम
तभी देश के कष्‍ट मिटेंगे, पाएंगे सुख-धाम
अपने मन का रावण मारें, यही आज पैगाम।
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3 टिप्‍पणियॉं:

girish pankaj ने कहा…

धन्यवाद जाकिर भाई, इस उदारता के लिए

mahendra mishra ने कहा…

सुंदर रचना अभिव्यक्ति ... बधाई
दशहरा पर्व पर हार्दिक बधाई शुभकामनाएं

ASHISH JAIN ने कहा…

गिरजा शंकर सर बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति,रजनीश सर मेरी भी एक रचना है क्या वह भी हमराही के इस पृष्ठ पर आ सकती है जो की बेटी बचाओ पर आधारित है

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