भ्रष्‍टाचार आज बैठा है सिर पर ताज धरे।

-डॉ0 ओमप्रकाश सिंह -

भ्रष्‍टाचार आज बैठा है
सिर पर ताज धरे।

कई हजारे
अन्‍ना चीखें
रामदेव चिल्‍लायें
गांधीवादी
हथियारों से
लड़ने को मुंह बायें
अनुत्‍तरित प्रश्‍नों के आगे
पथ पर गाज गिरे।

चटक रहीं
सीमाएं मन की
क्षुब्धित है परिवेश
सच के द्वार
झूठ बैठा है
लगती संधि ि‍वशेष
संशय की
खिडकी से कोई
क्‍या अंदाज करे।

संकल्‍पों के
हरित खेत में
गिरी हुई फसलें
पथराये
घर के आंगन से
बदल रही नस्‍लें
टूटे मन पर
गांठ पड़ गई
कौन इलाज करे।
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