एक सदी शोषण की जी ली...

एक सदी शोषण की जी ली...
-रामेन्‍द्र त्रिपाठी

एक सदी शोषण की जी ली, अगली फिर जीनी है डर की।
दोहरे मापदण्‍ड जीवन के, फूल गाँव के, गंध नगर की।।

चक्रवृद्धि का ब्‍याज चुकाकर सचमुच सस्‍ते छूटे,
बाहर बाहर ही हम साबुत, भीतर-भीतर टूटे।
वैसे ही फिर याद आ गई, अपने कच्‍चे घर की।।

झूठे धनुष, बाण सब झूठे, लक्ष्‍य भेद क्‍या जानें,
भौतिकता में खो बैठे हैं, हम अपनी पहचानें।
सच तो यह है चिन्‍ता है बस सबको आज उदर की।।

महारथी अभिमन्‍यु वध तक सीमित हैं बेचारे,
कैसे जिये परीक्षित इसकी सोचे कौन विचारे।
अंधियारे ने काली कर दी चादर है खद्दर की।।

Keywords: Ramendra Tripathi, Kavita, Geet, Hindi Poetry, Geetkar, Hindi Poet, Modern Hindi Poet, Adhunik Kavita
Post Written by +DrZakir Ali Rajnish
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2 टिप्‍पणियॉं:

बेनामी ने कहा…

sundar rachna.badhayi
anupam mishra, kanpur

dr manoj singh ने कहा…

umda rachna

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