जागो पहरेदार, लुटेरे आए हैं...


लुटेरे आए हैं...
-रजनीकांत शुक्‍ल

जागो पहरेदार, लुटेरे आए हैं।
हाथ करो हथियार, लुटेरे आए हैं।

बहुत सो लिए कुंभकर की निद्रा में,
अब न करो तुम प्‍यार लुटेरे आए हैं।

दो रंगा है खून, दोमुंही बातें हैं,
बनकर रंगे सियार, लुटेरे आए हैं।

मौसम में दलाव, बदौलत इनकी है,
फाश हो रहे राज, लुटेरे आए हैं।

राणा का भाला, झांसी की रानी की,
कहां गई तलवार, लुटेरे आए हैं।

पूजे जाते कांटे, फूल सिसकते हैं,
बदली चमन बहार, लुटेरे आए हैं।

हालात बदतर हुई, एक ही कारण है,
माफ किया हर बार, लुटेरे आए हैं।

बूढ़ा मर्द, जवां, बच्‍चा, औरत कोई,
खून इन्‍हें दरकार, लुटेरे आए हैं।

आजानों की सदा, वेद पाठों की गूंज,
बदल गई झंकार, लुटेरे आए हैं।

ऊधम की पिस्‍तौल, भगत का बम कहां,
गिद्ध बने सरदार, लुटेरे आए हैं।

Keywords: Rajnikant Shukla, Ghazal, Hindi Kavita, ग़ज़ल,
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9 टिप्‍पणियॉं:

ओमप्रकाश कश्यप ने कहा…

सुंदर, मनभावन, प्रेरणास्पद कविता

Prakash Jain ने कहा…

bahut khoob

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावी !!!
जारी रहें,

शुभकामना !!

आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज)

Layak Ram Manav ने कहा…

Sadhuwad!

mridula pradhan ने कहा…

gazal achchi lagi.....

nilesh mathur ने कहा…

बहुत सुंदर।

Vinay Prajapati ने कहा…

अति सुंदर कृति
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आशा जोगळेकर ने कहा…

Bahut prerak rachana.

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