जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं!

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं
 -रमेश तैलंग

दुःख दर्द की मिठास को खारा नहीं बना.
खामोशी को ज़ुबान दे, नारा नहीं बना.

जिसने जमीन से लिया है खाद औ’ पानी
उस ख्वाब को फ़लक का सितारा नहीं बना.

वो बेज़ुबां है पर तेरी जागीर तो नहीं,
उसको, शिकार के लिए, चारा नहीं बना.

घुटने ही टेक दे जो सियासत के सामने,
अपने अदब को इतना बिचारा नहीं बना.

जज़्बात कोई खेल दिखाने का फ़न नहीं
जज़्बात को जादू का पिटारा नहीं बना.

इंसान की फितरत तो है शबनम की तरह ही,
अब उसको, जुल्म कर के, अंगारा नहीं बना.

6 टिप्‍पणियॉं:

राकेश कौशिक ने कहा…

बेमिशाल ग़ज़ल - आभार

sushma 'आहुति' ने कहा…

behtreen gazal....

deepak kripal ने कहा…

beautiful..

dr sunil arya ने कहा…

poetry at its best...
bahut samay se itna achha nhi pada tha....
thnx..

dr sunil arya ने कहा…

poetry at its best....
bahut samay se itna achha nahi pada tha.
tnx.....

Vinay Prajapati ने कहा…

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

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