डॉ0 सुरेश उजाला के हाइकु


हुई खिन्‍नता
व्‍यक्ति-व्‍यक्ति में देख
भेद-भिन्‍नता।

भू पे आकर
पढ़े कबीर सिर्फ
ढ़ाई आखर।

पाते ही मौका
इंसान ने त्‍वरित
दिया है धोखा।

रहा है बेल
चकले पे आदमी
दिमागी रोटी।

वृक्ष हो गई
जो पीढि़यां गल के
कुछ बो गई।

बदला वक्‍त
सब से सस्‍ता हुआ
इंसानी रक्‍त।

गाढ़ी कमाई
देश के कमेरों की
गुण्‍डों ने खाई।
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4 टिप्‍पणियॉं:

veerubhai ने कहा…

गाढ़ी कमाई
देश के कमेरों की
गुण्‍डों ने खाई।
असरदार व्यंग्य लिए हैं न्यूक्लियर मिसाइल से ये हाइकु लक्ष्य भेदी हैं सारे हाइकु .कृपया कभी कभार यहाँ भी आया करें -
ram ram bhai
रविवार, 20 मई 2012
ये है बोम्बे मेरी जान (भाग -२ )
ये है बोम्बे मेरी जान (भाग -२ )
http://veerubhai1947.blogspot.in/

Yogesh.(yogesh911@gmail.com) ने कहा…

nice poem.

dr.mahendrag ने कहा…

बदला वक्‍त
सब से सस्‍ता हुआ
इंसानी रक्‍त।
सुन्दर अभिवयक्ति

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - बामुलिहाज़ा होशियार …101 …अप शताब्दी बुलेट एक्सप्रेस पधार रही है

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