कितना अच्‍छा लगता है -नेहा शेफाली


कितना अच्‍छा लगता है
-नेहा शेफाली

कितना अच्‍छा लगता है
नदी किनारे शाम को तुम्‍हारे साथपानी में पैर डुबाकर बैठना
तुम्‍हारा मेरे बालों को सफेद फूलों से सजाना
मेरे साथ
रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे भागना
आड़े-तिरछे झूलों पर फुदकना
और फिर काले खट्टे गोले की चुस्कियाँ लेना
वो लुका-छुपी खेलना
मेरा झाडि़यों में छिपना
और चोटिल होना
मम्‍मा इदल आओ
वो सुबकना, और
तुम्‍हारा मुझे गोद में उठाकर फुसलाना
मुझे बढ़ते हुए देखना
मेरी दनि भर की चटर-पटर पर खिलखिलाना
कॉलेज के दोस्‍तों के किस्‍से बताना
और तुम्‍हारा वो बेटा जल्‍दी आना
सब याद आता है माँ
जब कभी अकेली होती हूँ

तुम्‍हें लगता है कि मैं बड़ी हो गयी हूँ
पर मुझे आज भी अच्‍छा लगता है
काली खूबसूरत रातों को
तुम्‍हारी गोद में सिर रखकर
सितारों संग सैर पर जाना।
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7 टिप्‍पणियॉं:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

तुम्‍हें लगता है कि मैं बड़ी हो गयी हूँ
पर मुझे आज भी अच्‍छा लगता है
काली खूबसूरत रातों को
तुम्‍हारी गोद में सिर रखकर
सितारों संग सैर पर जाना।
kamaal ki bhawna

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

maan ke liye bacce kabhi bade nahin hote
bahut sundar !!

Prakash Jain ने कहा…

bahut sundar


www.poeticprakash.com

mridula pradhan ने कहा…

ekdam bhawna ki lay par gungunati si.....pyari si.....

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर
क्या बात है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये सच है की प्यार में कोई बड़ा नहीं होना चाहता ... नेह के रस से बाहर आना संभव नहीं होता ... सुन्दर कविता है ...

abhi ने कहा…

:)
प्यारी सी कविता :)

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