मुझे शाखों से गिरने का डर है :रशिम प्रभा



 

दर्द को हम बाँट लेंगे
-रश्मि प्रभा 

तुम्हें क्या लगता है
मुझे शाखों से गिरने का डर है 
तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है 
कैसे लगता है 
तुमने देखा न हो
पर जानते हो 
मैं पतली टहनियों से भी फिसलकर निकलना
बखूबी जानती हूँ ....
डर किसे नहीं लगता 
क्यूँ नहीं लगेगा 
क्या तुम्हें नहीं लगता ...
तुम्हें लगता है 
मैं जानती हूँ 
संकरे रास्तों से निकलने में तुम्हें वक़्त लगा 
मैं धड़कते दिल से निकल गई 
बस इतना सोचा - जो होगा देखा जायेगा ...
होना तय है , तो रुकना कैसा !
एक दो तीन ... सात समंदर नहीं
सात खाइयों को जिसने पार किया हो
उसके अन्दर चाहत हो सकती है
असुरक्षा नहीं ...
और चाहतें मंजिल की चाभी !
स्त्रीत्व और पुरुषार्थ का फर्क है 
वह रहेगा ही 
वरना एक सहज डर तुम्हारे अन्दर भी है
मेरे अन्दर भी ...
तुम्हारे पुरुषार्थ का मान यदि मैं रखती हूँ 
तो मेरे स्त्रीत्व का मान तुम भी रखो 
न तुम मेरा डर उछालो 
न मैं .... 
फिर हम सही सहयात्री होंगे 
एक कांधा तुम होगे 
एक मैं ..... दर्द को हम बाँट लेंगे !!!

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17 टिप्‍पणियॉं:

Sunil Kumar ने कहा…

मेरे डर को ना ............रश्मि जी क्या बात है बहुत बहुत बधाई और जाकिर जी आपका आभार

veerubhai ने कहा…

न तुम मेरा डर उछालों ,न मैं ........आओ एक दूजे के हो जाएँ सहजीवन संवर्धन पायें ,सुन्दर अभि- व्यक्ति को पंख लगाती रचना .कृपया यहाँ भी कृतार्थ करें .http://veerubhai1947.blogspot.com/
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

वाणी गीत ने कहा…

न तुम मेरा डर उछालों ,न मैं...
इनकी लिखी मेरी पसंदीदा कविताओं में से एक है !

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

तुम्हारे पुरुषार्थ का मान यदि मैं रखती हूँ
तो मेरे स्त्रीत्व का मान तुम भी रखो

Nice post.

आपके लिंक हैं प्यारे प्यारे
लेकिन हमारा लिंक है न्यारा न्यारा
यक़ीन न आए तो ख़ुद देख लीजिए
बिना लाग लपेट के सुना रही हैं खरी खरी Lady Rachna

Maheshwari kaneri ने कहा…

न तुम मेरा डर उछालों ,न मैं...bahut sundar...

वन्दना ने कहा…

जीवन जीने का सही तरीका बता दिया है………सुन्दर रचना।

सदा ने कहा…

फिर हम सही सहयात्री होंगे
एक कांधा तुम होगे
एक मैं ..... दर्द को हम बाँट लेंगे !

आदरणीय रश्मि जी, की इस बेहतरीन रचना को उनके ब्‍लॉग पर पढ़कर पहले भी मैं नि:शब्‍द थी आज भी ...आपका इस अनुपम प्रस्‍तुति के लिये आभार रश्मि जी को बधाई के साथ शुभकामनाएं ।

sushma 'आहुति' ने कहा…

आदरणीय रश्मि जी..की सभी रचनाये पढ़ते रहते है उनकी हर रचना जीवन का कोई न कोई अहम् पहलु छिपा होता..जो रचना के द्वारा वो हम तक पहुचती है... उनकी हर रचना निशब्द कर देती है... बहुत बहुत बधाई...

PK Sharma ने कहा…

kya baat hai shab ji maar hi daloge

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत सुंदर रश्मि आंटी......गहराई तक छू गयी यह कविता।

वीना ने कहा…

तुम्हारे पुरुषार्थ का मान यदि मैं रखती हूँ
तो मेरे स्त्रीत्व का मान तुम भी रखो
न तुम मेरा डर उछालो
न मैं ....
फिर हम सही सहयात्री होंगे
एक कांधा तुम होगे
एक मैं ..... दर्द को हम बाँट लेंगे !!!

बेहतरीन...

RAJWANT RAJ ने कहा…

aaj stri patrta ki mang krti hai purush se , sirf anugamini n bn kr vh shchri bnna chahti hai apni asmita ke sath bgair koi smjhouta kiye tbhi sadhikar khti hai ydi mai man rkhti hun to tum bhi man rkho .

isi bhav pr meri trf se do pnktiya arj hai ---
mere pas dher sara pyar hai
tum patr bn jao .

Rajiv ने कहा…

दीदी,बहुत दिनों बाद लेकिन बहुत सारगर्भित और स्वयं को बल प्रदान करनेवाली रचना.

veerubhai ने कहा…

...क्‍या भारतीयों तक पहुच सकेगी यह नई चेतना ?
Posted by veerubhai on Monday, August 8
Labels: -वीरेंद्र शर्मा(वीरुभाई), Bio Cremation, जैव शवदाह, पर्यावरण चेतना, बायो-क्रेमेशन /http://sb.samwaad.com/
तुम्हारे पुरुषार्थ का मान यदि मैं रखती हूँ
तो मेरे स्त्रीत्व का मान तुम भी रखो
न तुम मेरा डर उछालो
न मैं ....
फिर हम सही सहयात्री होंगे
एक कांधा तुम होगे
Monday, August 8, 2011
यारों सूरत हमारी पे मट जाओ .
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/2011/08/blog-post_8587.html

"पलाश" ने कहा…

bahut bahut achchhi lagi aapki rachnaa ..

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता !

प्रियम्बरा ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण पंक्तियाँ .

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