बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है, ठूंठ में भी सेक्‍स का एहसास लेकर क्‍या करें?

-अदम गोंडवी-

वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं,
वे अभागे आस्‍था, विश्‍वास लेकर क्‍या करें?

लोकरंजन हो जहाँ शम्‍बूक-वध की आड़ में,
उस व्‍यवस्‍था का घृणित इतिहास लेकर क्‍या करें?

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास,
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें ?

बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है,
ठूंठ में भी सेक्‍स का एहसास लेकर क्‍या करें?

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे,
पारलौकिक प्‍यार का मधुमास लेकर क्‍या करें?

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23 टिप्‍पणियॉं:

kunnu ने कहा…

सुंदर और प्रभावशाली गजल है। एकदम दुष्यंत जी के तेवर की।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

हर शेर बेहद उम्दा ,पूरी ग़ज़ल का तेवर ही अलग है
हर शेर शायर के एह्सासात की तकमील करता है
वाह!

Anushka ने कहा…

Yatharthparak rachna,

Gourav Agrawal ने कहा…

बहुत गहरे अर्थ वाली कविता है

पर ये शम्बूक - वध क्या है ??
ब्रह्मांड पुराण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, कूर्म पुराण, वाराह पुराण, लिंग पुराण, नारद पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण, हरिवंश पुराण, नरसिंह पुराण में कहीं भी नहीं मिल रहा ??

बेनामी ने कहा…

Shambook ke bare men yaha dekhe
http://vasantbhatt.blogspot.com/2009/04/blog-post_25.html

Gourav Agrawal ने कहा…

इस तरह बेनामी कमेन्ट करने की कोई जरूरत नहीं है मित्र

मैं इस आधार पर कहा रहा हूँ

http://bksinha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html

Zeba Khan ने कहा…

Bari gambheer kavita hai.

कुमार राधारमण ने कहा…

शरीर,मन और आत्मा की आवश्यकताएं अलग-अलग होती हैं। ये तीनों प्रकार की आवश्यकताएं क्रमशः परस्पर आबद्ध भी हैं। एक पूरी हो,तभी दूसरे की अनुभूति संभव।

अनुष्का श्रीवास्तव ने कहा…

अपने पल्ले नहीं पडी।

Amit ने कहा…

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे,
पारलौकिक प्‍यार का मधुमास लेकर क्‍या करें?

Lovely sher.

Gourav Agrawal ने कहा…

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे,
पारलौकिक प्‍यार का मधुमास लेकर क्‍या करें?

ये लाइन तो सच में बेहतरीन है
बेहद गहरी सोच

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
आभार, आंच पर विशेष प्रस्तुति, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पधारिए!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Arvind Mishra ने कहा…

इस कविता को इन दिनों लगाने का क्या मतलब है जब चारो और से सहिष्णुता और साहचर्य की पुकार हो रही है !

Kunwar Kusumesh ने कहा…

अदम गोंडवी जी की ये ग़ज़ल भी अच्छी है,पर इसका मत्ला कहाँ हैं? कृपया इसे मत्ले के साथ disply करें तो मज़ा आएगा.
कुँवर कुसुमेश
मोबा: 09415518546
blog:kunwarkusumesh.blogspot.com

सलीम ख़ान ने कहा…

मिश्रा जी से सहमत !!

Suresh Chiplunkar ने कहा…

:) मिश्रा जी, पोस्ट टाइटल में "सेक्स" शब्द रखने से कई लोगों की कई प्रकार की भूख शांत होती है… :)

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

चिपलूनकर जी, देखिए न आप ही खिंचे चले आए.... पहली बार… :)

Suresh Chiplunkar ने कहा…

यानी ज़ाकिर भाई मानते हैं कि "बुद्धिजीवी" शब्द पढ़कर कोई आ ही नहीं सकता… सिर्फ़ "सेक्स" पढ़कर ही आ सकता है… :) :) धन्य हो।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

चिपलूनकर जी, हमराही पर आप पहली बार पधारे थे और आपने आते के साथ ही कारण भी बता दिया...। तो मेरे जैसा नासमझ और क्या समझता?
आगे से इसका भी ध्यान रखा जाएगा।:)

Kunwar Kusumesh ने कहा…

चिपलूनकर जी,
किसी रचना को display करने के २४ घंटे के अन्दर ही १९ टिप्पणियों का आना रचनाकार को दाद का हक़दार बनाता है तो उस रचना को और उस पर आकर्षक हेडिंग लगाने के लिए blogar भी प्रसंशा का हक़दार है, इस लिहाज़ से जाकिर भाई भी प्रसंशा के पात्र हुए.

कुँवर कुसुमेश

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

ओमप्रकाश कश्यप ने कहा…

अदम गोंडवी की रचनाओं में मिट्टी की गंध होती है. दो रचनाकारों के बीच तुलना करना हालांकि बहुत अच्छी बात नहीं है. लेकिन एक बंधु ने ‘दुष्यंत के तेवर की’ रचना कहकर अवसर दिया है तो मैं कहना चाहूंगा कि दुष्यंत साहब की रचनाओं में राजनीति मुखर है. आम आदमी वहां भी है, परंतु वह शहरियत के सांचे में खुद को ढालने की कोशिश में जुटा और करीब-करीब कामयाब हो चुका मध्य वर्ग है. अदम गोंडवी साहब के कथ्य में गांव, आम आदमी और सामाजिक मुद्दे अपेक्षाकृत खुलकर आते हैं. उनकी कविता विकास के नाम पर गांवों के छले जाने की कविता है. वैसे प्रत्येक रचनाकार का अपना वितान और व्याप्ति होती है. इसके आधार पर कोई छोटा-बड़ा नहीं हो जाता.
यह रचना अद्भुत, अनूठी और विरल है.

ओमप्रकाश कश्यप ने कहा…

अदम गोंडवी की रचनाओं में मिट्टी की गंध होती है. दो रचनाकारों के बीच तुलना करना हालांकि बहुत अच्छी बात नहीं है. लेकिन एक बंधु ने ‘दुष्यंत के तेवर की’ रचना कहकर अवसर दिया है तो मैं कहना चाहूंगा कि दुष्यंत साहब की रचनाओं में राजनीति मुखर है. आम आदमी वहां भी है, परंतु वह शहरियत के सांचे में खुद को ढालने की कोशिश में जुटा और करीब-करीब कामयाब हो चुका मध्य वर्ग है. अदम गोंडवी साहब के कथ्य में गांव, आम आदमी और सामाजिक मुद्दे अपेक्षाकृत खुलकर आते हैं. उनकी कविता विकास के नाम पर गांवों के छले जाने की कविता है. वैसे प्रत्येक रचनाकार का अपना वितान और व्याप्ति होती है. इसके आधार पर कोई छोटा-बड़ा नहीं हो जाता.
यह रचना अद्भुत, अनूठी और विरल है.

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