सीली हुई लकड़ी

-पवन कुमार जैन

सीली हुई लकड़ी
जलती नहीं
केवल सुलगकर धुआं देती है।
लकड़ी में छिपी हुई
पानी की चंद बूंदें
उसके मौलिक गुण
प्रज्जवलन को, रोक देती हैं
और मजबूर करती हैं
कि वह जलकर
न तो रोटी बनाए
और न ही चिता जलाए
बल्कि आग को
धुएं में बदलकर, आंखों में घुसकर
लोगों को सुख देने की बजाए
बेवजह रूलाए।
लकड़ी का पानी से
असमय मिलन
उसे अपनों से
अलग कर देता है।
उसके अपने
यह सूखी लकडियां
रोटी पकाकर, चिता जलाकार
अपनी अस्मिता साकार कर
धू-धू कर खुश होती हैं।
जबकि सीली हुई लकड़ी
अपने अंदर घुसे पानी को
आँसू बनाकर
बाहर निकालने का
करती रहती है अथक प्रयास।

A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Pawan Kumar Jain

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