भीड़

–सुरेश उजाला

भीड़–
खुश रहती है
उत्सव–पर्व
आयोजनों में

भीड़–
खामोश हो जाती है
गम–दु:ख
दर्द में

भीड़–
उग्र हो उठती है
समस्या–आंदोलन
जनहित
और उसके समाधान में

लेकिन–
भीड़
जब भाड़ बनती है–
तो ईंधन के पास
कोई तर्क नहीं होता
सिवा जलने के।

A Hindi Poem (Nayi Kavita) by Suresh Ujala

1 टिप्‍पणियॉं:

बेनामी ने कहा…

...please where can I buy a unicorn?

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