प्रतीक्षा

-ज़ाकिर अली 'रजनीश'

रूप तुम्हारा देखूं मन में केवल इतनी इच्छा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

नयन राह पर लगे हुए हैं हटती नहीं निगाहें।
कब तुमसे मिलवाएंगी मुझको ये सूनी राहें।

और अभी कब तक देनी है मुझको कठिन परीक्षा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

मन मछली सा तड़प रहा कब पाएगा ये राहत।
कानों में रस घोलेगी कब तेरे स्वर की आहट।

दीन हुआ जाता मैं प्रतिपल भाती कोई न शिक्षा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

आओ प्रिय कैसे भी टूटे न ये मेरी आशा।
मन की प्यास बुझाओ पूरी कर दो हर अभिलषा।

मांग रहा हूं तुमसे मैं सानिध्य लाभ की भिक्षा।
टूट रहे हैं बांध असह्य होती जा रही प्रतीक्षा।

A Hindi Poem (Geet) by Zakir Ali 'Rajneesh'

3 टिप्‍पणियॉं:

mehek ने कहा…

bahut hi sundar pratiksha hai,yaha bahut alag alag kaviyon ki kavita padhne ko mili,bahut hi achha laga,jara nawazi ke liye shukriya,aap jaisi mahan hasti ke samne hum bahut nanhihai abhi,in min 3 mahine se likhna shuru kiya hai,thank u very much.

POOJA... ने कहा…

waah... ye intzaar bhi bada mishkil hai...
bahut hi sundarata se rach diye aapne saare kshan...
मन मछली सा तड़प रहा कब पाएगा ये राहत।
कानों में रस घोलेगी कब तेरे स्वर की आहट।
sabse pasandida...

मेरा साहित्य ने कहा…

sunder bhava .uttam shabd
bahut khoob
rachana

सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं